Home

जाहनवा ठाकुरानी

ॐ विष्णुपाद 108 त्रिदण्डी स्वामी श्री श्रीमत भक्ति श्रवण तीर्थ गोस्वामी महाराज की जय !

 

जान्हवा ठकुरानी का जन्म स्थान अंबिका कालना था। इनके पिता का नाम श्री सूर्य दास पंडित सरखेल और माँ का नाम भद्रावती देवी था। सूर्य दास को सरखेल उपाधि राजा ने दी थी क्योंकि वे गौड़ देश के लेखपाल थे । सूर्य दास की दो कन्याएँ थीं। बड़ी वसुधा और छोटी, जान्हवा अथवा जान्हवी।

एक दिन महाप्रभु ने नित्यानंद प्रभु से कहा, “यदि तुम भी सन्यासी का जीवन स्वीकार करोगे तब इस संसार के सांसारिक और पतित लोगों का उद्धार कैसे होगा? तुम जाओ, गौड़ वापस लौटो और गृहस्थ होकर भजन संकीर्तन का उपदेश दो और भक्ति को निरंतर उजागर करो।

नित्यानद प्रभु अपने प्रिय शिष्य उद्धरणदत्त के साथ सूर्य दास के निवास स्थान पर गए। उन्होंने सूर्य दास की बड़ी पुत्री वसुधा से विवाह का प्रस्ताव रखा:“मैं विवाह करना चाहता हूं; अपनी कन्या का हाथ मेरे हाथ में दे दीजिए।” परन्तु सूर्य दास ने यह स्वीकार नहीं किया क्योंकि नित्यानंद ने अपना वर्ण त्याग दिया था। सूर्य दास की अस्वीकृति पाकर नित्यानंद प्रभु लौट गये।

वसुधा को जब यह ज्ञात हुआ कि सर्वव्यापी भगवान उनसे विवाह करना चाहते थे, वे प्रेमासक्त हो गईं परंतु जब उन्हें यह पता चला कि उनके पिता ने विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है वे मूर्छित हो गईं। वैद्य को बुलाया गया परंतु उनकी चेतना वापस नहीं आई और उन्होंने प्राण त्याग दिए।

इस दुःखद समाचार को पाकर गौरी दास वहाँ आए और अपने बड़े भाई सूर्य दास के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने सूर्य दास से प्रार्थना की कि नित्यानंद प्रभु को वापस बुलायें क्योंकि केवल वही वसुधा को पुनः जीवित कर सकते थे।
वसुधा का शरीर अन्तिम संस्कार के लिए गंगा तट पर लाया गया। नित्यानंद प्रभु वहां आये और सूर्य दास उनके चरणों में गिर पडे़। उन्होंने अनुनय विनय करते हुये कहा,“कृपया मेरी पुत्री को जीवित कर दीजिये।”
नित्यानंद प्रभु ने सूर्यदास  से कहा, “यदि तुम्हें अपनी कन्या का विवाह मेरे साथ करना स्वीकार हो तो मैं उसे जीवित कर दूंगा।”
सूर्य दास ने सहमति दे दी।

नित्यानंद प्रभु के अलौकिक शरीर की दिव्य गंध ने वसुधा को स्पर्श किया और उनकी नासिका के द्वारा वसुधा के शरीर में प्रवेश किया। वसुधा की चेतना वापस आ गई और उन्होंने आंखें खोल कर प्रभु का दर्शन किया।
“अब विवाह की तैयारी करो।”
“तुम एक अवधूत हो ।वैदिक संस्कारों के अनुसार स्वयं का शुद्धीकरण करो एवं यज्ञोपवीत धारण करो।”
नित्यानंद प्रभु रीति रिवाजों से परे थे, फिर भी उन्हें जैसा बोला गया उन्होंने किया। पर यह भी कहा, तुम जो चाहो वह करो, मेरा उससे कोई सरोकार नहीं है।आज परम ईश्वर केवल चैतन्य गोस्वामी हैं।”

विवाह के पश्चात् एक दिन जब नित्यानंद प्रभु भोजन कर रहे थे और जान्हवा भोजन परोस रही थीं, अचानक जान्हवा का घूंघट सरका। जैसे ही नित्यानंद प्रभु की दृष्टि उन पर पड़ी, उन्हें ज्ञात हो गया कि जान्हवा उनकी पूर्ण शक्ति हैं। उनकी प्रियतमा। उन्होंने सूर्य दास से कहा, “तुम अपनी छोटी पुत्री को मुझे दहेज में दे दो।”
सूर्य दास ने कहा, “मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो मैं आपको नहीं दे सकता। मेरा धन, जाति घर-बार और यहां तक कि मेरा जीवन भी, सब कुछ आप को समर्पित है।

विवाह के पश्चात नित्यानंद अपनी पत्नियों के संग बडगाछी आए। वहाँ उन्हें श्रीवास पंडित की पत्नी मालिनी का आशीर्वाद मिला। इसके पश्चात् वे शची माता का आशीर्वाद लेने नवद्वीप गए। वे कुछ समय सप्तग्राम में रुके। अंततः वे खड़दाह आए। वसुधा ने आठ पुत्रों और एक पुत्री को जन्म दिया। सात पुत्र एक के बाद एक दिवंगत हो गये। केवल पुत्री गंगा और सबसे छोटे पुत्र वीरचंद्र या वीरभद्र जीवित बचे।

जान्हवा की कोई संतान नहीं थी। पर वीरचंद्र उन्हें अत्यधिक प्रिय थे।
वीरचंद्र अद्वैत आचार्य के शिष्य बनना चाहते थे और इस ध्येय से शांतिपुर जाना चाहते थे। परंतु जान्हवा ने उन्हें रोका और कहा, “तुम्हें दूर जाने की आवश्यकता नहीं है।  मुझसे दीक्षा लो और मेरे शिष्य बनो।”
वीरचंद्र ने मां जान्हवा से दीक्षा ली।

प्रेम एवं भक्ति का अनमोल रत्न प्रदान करने में पूर्ण रूप से अनुभवी जान्हवा संपूर्ण वैष्णव समाज की आदरणीय हैं। इसलिए उन्हें खेतुरी के महोत्सव में आमंत्रित किया गया।
वसुधा से अनुमति लेकर जान्हवा ने गंगा एवं वीरचंद्र के साथ खड़दाह से प्रस्थान किया । उनके साथ अनेक परम वैष्णव तथा संत यथा वृंदावनदास, बलरामदास, ज्ञानदास एवं नयन मिश्रा भी गए। नयन मिश्रा उनके दल में हलिशहर से सम्मिलित हुये। जैसे वे एक गांव से दूसरे गांव चलती गईं, लोगों की भीड़ भी बढ़ती गई। गांव के गांव हरिनाम से आप्लावित हो गये। यात्रा करते समय जान्हवा ने कुछ स्थानों पर विश्राम किया- नवद्वीप में श्रीवास पंडित के निवास स्थान पर, अकाईहाट में कृष्ण दास के घर, कंटक नगर में गंगाधर दास के गौरांग मंदिर में एवं बुद्धिग्राम में रामचंद्र कविराज के घर। अंततः वे जब खेतुरी पहुँचीं, उनका भव्य स्वागत हुआ।

देवी जान्हवा आ गई हैं!

एक पृथक गृह उनके रहने के लिए आवंटित किया गया जहाँ वे अपने भक्तों के साथ रहीं।
फाल्गुनी पूर्णिमा पर छह विग्रहों का प्रतिष्ठापन हुआ। प्रतिष्ठापन के पश्चात जन्हवा देवी ने श्रीनिवास आचार्य से चैतन्य महाप्रभु के भक्तों में माला और चंदन वितरण करने को कहा।

तत्पश्चात् उन्होंने नरसिंह चैतन्य को माला अर्पण करने को कहा।इसके बाद उन्होंने स्वयं माला एवं चंदन स्वीकार किया ।फिर उन्होंने गौर भजन एवं संकीर्तन आरंभ करने का आदेश दिया।
खेतुरी में प्रेम के भजनों  की बाढ़ आ गई ।श्रीमन्महाप्रभु भजन प्रेमी थे। वे संकीर्तन स्थल पर अपने शिष्यों के साथ आए । एक क्षण के लिए सभी ने भगवान के विद्युत की तरह चमकते आभामण्डल का दर्शन किया पर दूसरे ही क्षण सब कुछ अदृश्य हो गया।

जैसे ही महाप्रभु अदृश्य हुए, संकीर्तन स्थल विरह एवं रुदन से भर गया। वे सब कहां चले गए ? अद्वैत, नित्यानंद ,श्रीवास, मुरारी, हरिदास, गदाधर, वक्रेश्वर सभी तो यहाँ थे,  स्वरूप दामोदर, रामानंद सार्वभौम नरहरिभी ! वे सब कहां चले गए?

जान्हवा माता ने कहा ; “यह महाप्रभु की नरोत्तम एवं श्रीनिवास पर कृपा है।उन्होंने अपना यह वचन पूरा किया है कि जहाँ भी संकीर्तन होगा मैं वहां आऊँगा। अब फागु का लेप शुरू करो।”

जान्हवा देवी ने मंदिर में प्रवेश किया एवं प्रभु के पावन विग्रह को अबीर और गुलाल समर्पित किया। सभी के बीच होली के रंगों  से क्रीड़ा होने लगी। केवल मनुष्यों के बीच ही नहीं परंतु मनुष्य एवं भगवान के बीच भी ।आकाश एवं धरती रंगों से भरगए ।

संध्या आरती के पश्चात जान्हवा देवी ने श्रीनिवास से कहा, “अब तुम गौरांग महाप्रभु का आविर्भाव तिथि मनाओ।”

अगले दिन सुबह स्नान एवं पूजा के पश्चात जान्हवा माता ने रंधन आरंभ किया। भोग अर्पण करने के पश्चात् उन्होंने उसे सभी भक्तों में वितरित किया और सबके पाने के बाद स्वयं स्वीकार किया । उसके अगले दिन उन्होंने नरोत्तमदास ठाकुर से कहा, “अब मैं वृंदावन जाऊंगी।’
उन्हें कौन रोक सकता था? अपने सम्बन्धियों और कुछ अन्य लोगों जैसे कृष्णदास सरखेल, जमाई मध्वाचार्य, और गोपाल परमेश्वरी दास को लेकर वे वृंदावन गईं।

यात्रा  बहुत लम्बी थी। परंतु जान्हवा को कोई भय नहीं था।। शारीरिक कष्ट भी उन्हें आनंददायक प्रतीत होता था। जान्हवा ने एक ग्राम में विश्राम किया ; उस ग्राम के भक्तों ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। वहाँ पतित लोग भी थे जो वैष्णव सिद्धांतों के विरोधी थे । वे मानव पूजा को अस्वीकार करते थे क्योंकि वे उसे चंडी देवी के प्रति अपराध समझते थे।

परंतु चंडी देवी ने  इन पतित लोगों को स्वप्न दर्शन दिया और कहा, “जान्हवा भगवान् हैं, उनकी शरण ग्रहण करो अन्यथा मैं सबका विनाश कर दूंगी। प्रातः काल उठने पर ये पतित लोग जान्हवा देवी और उनके भक्तों के चरणों में गिर पड़े और जैसे ही उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया, उन्हें भक्ति- कृपा मिली ।

एक और दिन जब जान्हवा देवी किसी अन्य ग्राम  के नदी के किनारे विश्राम कर रहे थीं, कुछ डाकुओं ने उन्हें देखा। उनके सरदार कुतुबुद्दीन ने कहा, “गौड़ के लोगों के पास अवश्य ही बहुत धन होगा। हम उनका सारा धन उनसे छीन लेंगे । ” फिर उन्होंने अपने गुप्तचर से कहा कि पता करो वे क्या कर रहे हैं ।गुप्तचर ने उन्हें सूचित किया कि वे भगवान का कीर्तन करने के बाद विश्राम कर रहे हैं।

“तब यही सही समय है। अपने शस्त्र लेकर आओ एवं मेरे पास एकत्रित हो।” सरदार ने कहा। नदी का किनारा बहुत दूर नहीं था पर जैसे वह पथ पर चले वह बढ़ता ही चलागया । रात्रि समाप्त हो गई पर वे गौड़ के भक्तों तक पहुंच नहीं सके। डाकुओं का सरदार भयभीत हो गया और बोला कि यह अवश्य ही उसका चमत्कार है जिसे वे देवी कहते हैं ।“चलो चलें, उनकी शरण ग्रहण करें एवं इस घृणित कार्य को छोड़ दें।”

जैसे ही उन्हें इस बात का ज्ञान हुआ, वे तुरंत गौड़़ भक्तों तक पहुंच गए। वे जान्हवा माता के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे उनका उद्धार करें । उनका दिव्य स्वरूप करुणा से भर गया और जैसे ही उन्होंने उन डाकुओं पर कृपा करी वे कृष्ण नाम का कीर्तन करने करने लगे।

अंततः जान्हवा मथुरा पहुँचीं। यमुना के शान्त घाट पर उन्होंने स्नान किया। मथुरा के वैष्णव-भक्त उनके दिव्य दर्शन को आने लगे। उन भक्तों ने वृंदावन भी जान्हवा माता के आगमन का समाचार भेज दिया। वृंदावन के आचार्य भी आतुरता से आए। दोनों दल अक्रूर घाट पर मिले।
परमेश्वरी दास ने जान्हवा देवी का परिचय सबसे कराया - ये हैं गोपाल भट्ट, लोकनाथ और भूगर्भ - ये जीव गोस्वामी हैं। ये हैं कृष्णदास ब्रह्मचारी, कृष्णा पंडित और मधुपंडित। 
“आप के बीच यह कौन हैं?” “ये रामचंद्र कविराज के छोटे भ्राता गोविंद हैं। इनके जैसा वैष्णव भजन रचयिता अन्य कोई नहीं।”दिव्य-आनंद से दोनों  दल आप्लावित हो गए।

जीव गोस्वामी ने जान्हवा माता के निवास स्थान का प्रबंध किया। जान्हवा मंदिरों, विग्रहों एवं अन्य तीर्थ स्थानों का दर्शन करते हुए भ्रमण करती रहीं ।उन्होंने राधा कुंड पर रघुनाथ दास गोस्वामी से भेंट की। वे कृष्ण दास कविराज से भी मिलीं। जान्हवा वहाँ तीन-चारदिवस रहीं। उन्होंने स्वयं रंधन करके सबको प्रसाद सेवा कराई और महाप्रभु को भी भोग अर्पित किया।

एक दिन मध्यान्ह में जान्हवा ने राधा कुंड के तटपर बांसुरी की मंत्रमुग्ध कर देने वाली मधुर धुन सुनी। वे रोमांचित और व्याकुल हो उठीं। उन्होंने इधर -उधर दृष्टि डाली। और यह क्या, उन्होंने कदंब के वृक्ष के नीचे  मनोहर श्यामसुन्दर कृष्ण को श्रीमती एवं उनकी सखियों से घिरे हुये उनकी प्रिय बांसुरी बजाते हुए देखा। यह  दिव्य दृश्य देख वे समाधिस्थ हो गईं। जब उनकी चेतना लौटी तो वे विचारमग्न हो गईं कि इस अनुपम दुर्लभ और रहस्यमय अनुभव को गुप्त रूप से किसे बतायें!

जीव गोस्वामी ने जान्हवा के सम्मुख वैष्णव शास्त्र का पाठ किया। इसके पश्चात् उन्होंने बारह वनों का भ्रमण आरम्भ किया। भ्रमण समाप्त करने के बाद उन्होंने यमुना तट पर बसे एक गाँव में प्रवेश किया। वहां उन्होंने एक वृद्ध व्यक्ति को विलाप करते सुना। पूछने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि एक अबोध ब्राह्मण को उसकी वृद्ध अवस्था में एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। उस पुत्र का तरूणावस्था में आाज देहांत हो गया है। उसकी माँ अपनी गोद में पुत्र को लिए बड़े ही कातर स्वरमें रुदनकर रही थी और ब्राह्मण उच्च स्वर से गगनभेदी विलाप कर रहा था। जान्हवा करुणा से विव्हल हो उठीं। उन्होंने अपना हाथ उस मृत पुत्र को छूने के लिए बढ़ाया। उसकी शोक संतप्त माँ ने उन्हें रोकते हुए कहा,“मेरे पुत्र का स्पर्श मत करो। जान्हवाने पूछा, “क्यों? मैं तो तुम्हारे पुत्र को छूकर पवित्र हो जाऊंगी।” यह कहते हुए उन्होंने अपना हाथ उस मृत पुत्र के माथे पर रखदिया। बालक ने अपनी आंखें खोली और चारों तरफ देखा। फिर उसने जान्हवा का चरणस्पर्श किया और उठ खड़ा हुआ।”

क्या आश्चर्यजनक चमत्कार! करुणा का कैसा अद्भुत वितरण ! वह वृद्ध ब्राह्मण एवं उसकी पत्नी जान्हवा माता के चरणों में गिर पड़े और रुदन करने लगे। जान्हवा देवी ने कहा, “यह मेरी नहीं परंतु श्री कृष्ण की कृपा है। भगवान्श्री कृष्ण कृपा के परम उद्गम हैं। वे करुणा के परम पावन आगार हैं। तुम्हारे दुःख से  व्याकुल होकर उन्होंने करुणावश तुम्हारे पुत्र को पुनः सजीव कर दिया है। अब और रोने की कोई आवश्यकता नहीं। केवल भगवान कृष्ण की महिमा का गान करो और उनके नाम का निरन्तर जाप करो।

जान्हवा देवी राधा गोपीनाथ के मंदिर गईं और युगल जोड़ी का दर्शन किया। उन्हें सहसा ऐसा प्रतीत हुआ कि राधिका का विग्रह गोपीनाथ के विग्रह से छोटा है। उन्होंने सोचा,“अच्छा होता कि राधिका तनिक लंबी होतीं।” गौड़ वापस लौट कर उन्होंने राधिका का एक नया विग्रह लाने का निश्चय किया। यह बात उन्होंने नयन भास्कर से कही। उन्होंने कहा, “अब से हर समय गोपीनाथ के विग्रह का ध्यान करो ।उस भक्तिमय ध्यान में तुम उनकी प्रिया की झाँकी देखोगे।” नयन जान्हवा का आशय समझ गये।

इसके पश्चात जान्हवाने गौरी दास की समाधि का दर्शन किया और उनके ममेरे भाई बडू गंगादास से भेंट की। उन्होंने उनसे कहा,”मेरे साथ गौड़ चलो।”यह ज्ञात होने पर कि जान्हवा गौड़ वापस जा रही हैं, वृंदावन के एक भक्त ने उन्हें राधा कृष्ण का विग्रह भेंट में दिया । जान्हवा  ने गंगादास से कहा “अब और शब्द नहीं, गौड़ वापस जाने पर तुम इस विग्रह की पूजा अर्चना आरंभ करो।“

गौड़  पहुंचने पर जान्हवा सबसे पहले खेतुरी गईं । वहाँ तीन-चार दिवस रहने के बाद वे बुधरी गईं। वहाँ उन्होंने गंगादास का विवाह हेमलता से कराया जो श्यामदास चक्रवर्ती की पुत्री थीं। वहां से उन्होंने एकचक्र के लिए प्रस्थान किया जो भगवान नित्यानंद की जन्म स्थली है।

“एकचक्र भगवान का निवास स्थान है। शीघ्र ही प्रभु बलराम स्वयं को प्रकट करेंगे।” उन्होंने प्रभु नित्यानंद की कथा और मां पद्मावती की जीवनी भी सुनी। बड़ी रुचि से भगवान की बाल लीलाओं और उनकी वृंदावन यात्रा के बारे में उन्होंने सुना। इन में सबसे अधिक नित्यानंद की अलौकिक विलक्षण उपलब्धियों एवं लौकिक गृहत्याग करके सन्यास लेने तक की लीलाओं ने उन्हें सम्मोहित कर दिया।

एकचक्र छोड़ कर जान्हवा ठकुरानी जाजीग्राम गईं। वहां वे श्रीनिवास आचार्य से मिलीं। वहां से वे श्रीखंड गईं और रघुनंदन से भेंट की। वहां से वे नवद्वीप एवं श्रीवास पंडित के निवास स्थान परगईं। इसके पश्चात वे अंबिका होते हुए खड़दाह गईं जहां वे अपने पुत्र वीरचंद्र, पुत्री गंगा एवं बहन वसुधा से मिलीं।

कुछ ही दिनों में नयन भास्कर राधिका के विग्रह का निर्माण करके ले आए। विग्रह पूर्ण भक्ति, पवित्रता  और शुद्ध मन से बनाया गया था। सभी उसे देख मोहित और विस्मित हो गए। जान्हवा ने कहा, “अब इस विग्रह को वृंदावन कौन ले जाएगा?” परमेश्वरी दास ने सहमति दी एवं  नृसिंह चैतन्य सहचर होकर उनके साथ होकर गये।

रास्ते में कटवा में श्रीनिवास ने विग्रह के दर्शन किये। राजा वीर हमवीर ने गुप्त रूप से विग्रह की स्थापना के लिए एक सहस्त्र मुद्राऐं दीं । विग्रह  के वृंदावन पहुंचने पर यह निर्णय लेना था कि मूल विग्रह की स्थापना कहां होगी। जयपुर के राजा ने उसका दायित्व ले लिया। नूतन विग्रह को गोपीनाथ के बाईं ओर स्थापित किया गया। इस नए विग्रह को जान्हवा ठकुरानी अथवा जान्हवा राधिका नाम दिया गया ।

परमेश्वरी दास ने लौटने पर जान्हवा को सब कुछ विस्तार से बताया। जान्हवा ने उन्हें निर्देश दिया कि वे तारतपुर ग्राम जाएं और वहाँ राधा गोपीनाथ की पूजा- अर्चना करें।
इसके पश्चात्वे अपने परिजनों और शिष्यों के साथ वृंदावन गईं। “चलो चल कर गोपीनाथ और राधा के दर्शन करें।”

वृंदावन पहुंचकर जान्हवा राधा- गोपीनाथ के दर्शन करने गईं। पर उन्होंने यह क्या देखा ! गोपीनाथ बीच में और उनके बाईं और दाईं दोनों तरफ राधिका!! गोपीनाथ के दोनों ओर दो राधिकाऐं प्रतीत हो रही थीं।।जैसे किसी श्यामल वर्ण के तमाल वृक्ष को दो प्रेमी लताओं ने दोनों ओर से आलिंगन किया हुआ हो: एक काला मेघ बीच में और उसके दोनों ओर चमकती हुई विद्युत!

उन्होंने वह सब सामग्री जो वे राधा गोपीनाथ को अर्पण करने के लिए गौड़ देश से लाई थीं, उन्हें समर्पित किया। उन्होंने अनेक व्यंजनों का रंधन कर के उन्हें अपने हाथों से भोग समर्पित किया। एक दिन उन्होंने मंदिर में अकेले प्रवेश किया और द्वार स्वयं बंद हो गया।
गोपीनाथ ने जान्हवा के वस्त्रों को आकर्षित कर उन्हें अपनी बाईं तरफ बिठालिया।

गोपीनाथ जान्हवार बस्त्रो आकिर्षया
बशाइलो आपनार बामपाशेर लोइया

जब भक्तों ने द्वार खोला तो पाया कि जान्हवा एक स्वर्णिम विग्रह में परिवर्तित हो कर, गोपीनाथ के दाहिनी ओर उजागरहो गई हैं । श्री राधिका एवं जान्हवा बाईं और दाहिनी ओर, और मध्य में गोपीनाथ। इस दृश्य की उपमा देना असंभव है।

सबै  देखे कांचन प्रतिमा मूर्ति होइया
बिराजया गोपीनाथेर दखिने बासिया
बामपार्शे श्री राधिका दखिने जान्हवा
मध्ये गोपीनाथ इथे उपमा की देबा

 

श्री गुरु एवं गौरांग की जय!

यह हिन्दी अनुवाद परम पूज्य बाबा की प्रेरणा से किया गया एक विनीत प्रयास है।किसी भी तरह की त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी: सुनीता  थावानी

28.3.2021