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नकुल ब्रह्मचारी

ओम् विष्णुपाद १०८ त्रिडंडी स्वामी श्री श्रीमद् भक्ति श्रवण तीर्थ गोस्वामी महाराज

हारमोनिस्ट, नृसिंह चतुर्दशी  मई २००२ में प्रकाशितमूल बंगलालेख का हिन्दीअनुवाद

श्रीपाटकालना के आसपास पियारीगंज में नकुल का घर है।उनका पहले का नाम था प्रद्युम्न।वह नृसिंह देव के उपासक थे।प्रभु ने तभी उनका नाम दिया था नृसिंहान्द।

अंबिका कालना में नकुल के शरीर में प्रभु का आवेश हुआ।
जीवों के उद्धार के लिए तीन उपाय हैं - साक्षात दर्शन, आविर्भाव एवं आवेश।
नकुल में आवेश हुआ।

जब उनमें महाप्रभु का आवेश हुआ, तब जैसे वे ग्रहों से ग्रस्त हों; वैसेही वे कभी हँसते थे, कभी रोते थे, कभी गाते थे और कभी उन्मत्त होकर नाचते थे।महाप्रभु के समान ही उनके शरीर का रंग गौरहो गया।सर्वदाप्रेमावेश में वे प्रभु के जैसे ही सबकोकृष्ण नाम लेने को कहते कि कृष्ण नाम छोड़कर कोई उपाय नहीं है।एकदम ठीकप्रभु केजैसी ही उनकी वाणी और बोलनाभी हो गया।नकुल को देखने के लिए वहाँ के आसपास के लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।और क्या आश्चर्य,जो भी उनका दर्शन करता वह प्रेम में उन्मादित हो जाता।

शिवानन्द सेन की इच्छा हुईकि परीक्षा करके देखूँ, सच में प्रभु का आवेश है कि नहीं। प्रभु तो सर्वज्ञ हैं।सचमुच में प्रभु का आवेश उनमें है यदितो नकुल भी सर्वज्ञ हो उठेंगे। देखता हूँ,मैं छिप केरहूँगाकि नकुल मुझेमेरा नाम लेकर बुला सकेंगे कि नहीं।देखता हूँमेरा इष्ट मंत्र क्या है ,वे बता सकते हैं किनहीं।

लोग आ रहे हैं,जा रहे हैं, भीड़ जमा हो रही है; इतनी भीड़ कि सब लोगों को दर्शन भी नहीं मिल रहा।ऐसे समय नकुल ने कहा, शिवानन्द  दूर में मेरी प्रतीक्षा कर रहा है,उसकोकोईबुला कर ले आओ।
शिवानन्द! शिवानन्द! उनकोबुलाना आरंभ हो गया।शिवानन्द कौन हैं ? शिवानन्द कहाँ हैं? आपकोब्रह्मचारी बुला रहे हैं।

शिवानन्द ने आकरनमस्कार किया औरनकुल केपास बैठेप्रसन्न होकर।
पास बैठ कर उन्होंने अच्छा ही किया।नकुल ने कहा,“अब तुम्हारा इष्ट मंत्र क्या है, आओ मैं तुम्हें कान में बोल देता हूं।चार अक्षर के गौर गोपाल मंत्र से तुम्हारी दीक्षा हुई है।क्या यह ठीक नहींहै?”
“ठीक।” अब शिवानन्द को विश्वास हो गया।

प्रभु नीलाचल से वृंदावन जा रहे हैं, गौड़ के पथ मेंकुलिया आये हैं।
मन ही मनपथ तैयार कर रहे हैं नकुल,प्रभु के वृंदावन जाने कापथ।कल्पना की छवि आंक रहे हैं।
पहले मणिरत्न देकर पथ तैयार किया।पर वह रत्नों से बना हुआ पथ भीलगता है प्रभु के चरणों के लिए कठोर होगा।इसलिये उसके ऊपर उन्होंने फूलों की शैय्या बिछा दी।पथ के दोनों ओर बकुल वृक्ष लगादिये,बकुल पेड़ों की छाया से पथ शीतल रहेगा।फूलों की सुगंध से हवा आमोदित होकर विचरण करेगी।प्रभु को उतनी क्लांति नहीं होगी।पथ के आसपास उन्होंने बहुत से जलाशय बनाये, जिनकास्वच्छजल अमृत के समान सुस्वादु,जहां प्रभु अपनी इच्छा से  स्नान - पान कर सकेंगे।औरपेड़ - पेड़ पर सुंदर पक्षियों  की चहचहाहट,  जो प्राणों में आनंद जगायेगी, उत्साह जगायेगी।ऐसा प्रतीत होगा कि पक्षियों के कंठ से भी कृष्ण नाम का अमृत बरस रहा है।कल्पना के पथ पर विचरण करते- करते कानाइ नाटशाला के पास पहुँचतेहीनकुल रुक गए।उसके आगे उनका मन अग्रसर नहीं हुआ।

नकुल ने कहा,“इस बार प्रभु का वृंदावन जाना नहीं होगा।उनको कानाइ नाटशालासे ही वापस लौटना पड़ेगा।”
नकुल ने जो कहा वही हुआ।कानाइ नाटशालासे ही प्रभु लौट गए।

नकुल में प्रभु का केवल आवेश ही नहीं हुआ, नकुल के सामने प्रभु का आविर्भाव भी हुआ।
श्रीकान्त,शिवानन्द के भांजे एक बार रथयात्रा के बहुत पहले प्रभु के दर्शन की उत्कंठा से चले आये नीलाचल।

दो महीने रहने के बाद प्रभु ने उन्हें बांग्लादेश वापसजाने को कहा।उन्होंने कहा, “सबको कह देना, इस वर्ष कोई भी न आये।”
“कोई नहीं आयेगा?” श्रीकान्त के हृदय में जैसेपीड़ा ने आघात किया।
“ना।क्योंकि इस बार मैं ही पौष मास में आऊँगा।तुम्हारे मामा शिवानन्द के घर में रहूँगा।”
“सच?”, श्रीकान्त उल्लासित हो उठे।
“वहाँ पर जगदानन्द हैं,वे मेरे लिए रसोई कर पाएंगे।”
श्रीकान्त ने वापस आकर इस संवाद का सब में प्रचार कर दिया।जिन-जिन ने जाने की तैयारी की थी वे सब रुक गए।
प्रभु स्वयं आ रहे हैं, इससे सुखकरक्या!

पौष मास आते ही शिवानन्द प्रभु की भिक्षा के लिए द्रव्य संग्रह करने लगे।
किंतुकहाँ, महीना बीतने को आया, प्रभु तो आयेनहीं?
शिवानन्द मरणासन्न हो गए। जगदानन्द की भी यही अवस्था थी।प्रभु नेतोउनके हाथ की बनीरसोई खानी चाहीथी।तो क्या वेरसोई करना छोड़दें?
एक दिन नकुल आ उपस्थित हुए।
“देखो नृसिंहानन्दआये हैं।” शिवानन्द ने बहुत आदर सहित उनका स्वागत किया।
“किंतु तुम लोगनिरानंद क्यों हो?”
शिवानन्द ने उनके दुःख की बात कही। प्रभु ने कहा था आयेंगे, पर आये नहीं।खायेंगे पर खाए नहीं।
नकुल ने कहा, चिंता मत करो। मैं तीन दिन में प्रभु को यहाँ पर ले आऊँगा।

दो दिन ध्यान करने के बाद नकुल ने कहा “प्रभु पानीहाटी तक आ गए हैं।कल मध्यान्हयहाँआयेंगे।भिक्षा की तैयारी करो।मैं रसोई करूँगा।”
बहुत से व्यंजनजैसे पीठे, क्षीर और पायस नकुल ने बनाये।
तीन जनों के लिए भोग सजायानकुल ने।प्रथम जनस्वयं प्रभु,  द्वितीय जन जगन्नाथ एवंतृतीय जनउनके स्वयं के इष्टदेवनृसिंह।
तीनोंजनोंको भोग समर्पण करके फिर ध्यान में बैठे नकुल।
“अरे, अरे, क्या कर रहे हो? क्या कर रहे हो?” नकुल चिल्ला उठे,“तुम तीनों थालों से कैसे खा रहे हो?जगन्नाथ जी के साथ तो तुम्हारा एकात्म्यहै,तुमने उनका भोग खाया तो खायाकिंतु नृसिंह का भोग कैसे खा रहे हो?”

किंतु प्रभु ने आविर्भूत होकर नकुल को दिखादिया कि जैसे उनमें और जगन्नाथ में कोई भेद नहीं, नृसिंह के साथ भीउनका कोई भेद नहीं। नकुल तो मन-मन में समझते थे, अब आँखों के सामनेप्रत्यक्ष कर लिया।
“तुम्हारे प्रभु का व्यवहार तो देखो”,शिवानन्द कोउद्देश्य करते हुए नकुल ने कहा, “मेरे नृसिंहकाभोग भी खा गये।जगन्नाथ का खाए तो खाएकिंतु मेरे नृसिंह का खाए क्या समझ के?  मेरे नृसिंह आज उपवासी रह गए।”
यह सब क्या कह रहे हैं नकुल? यह सब क्या वे प्रेमावेश में बोल रहे हैं? यह सब क्याउनकी कल्पना का कार्यकलाप है? नहीं तो शिवानन्द  देख नहीं पाए क्यों?जगदानन्द का भी क्या अपराध?
फिर भी नकुल शिवानन्द केआग्रहका उल्लंघन नहीं कर पाये।* नृसिंहके लिए पुनःसमस्त व्यवस्था करी। फिर से भोग लगाया नकुल ने।

शिवानन्द के संशय की बात का आभास प्रभु ने पाया।
अगले वर्ष शिवानन्द जब नीलाचल गए, तब प्रभु ने कहा, “पिछले वर्ष पौष मास में तुम लोग के घर में मैंने कितना बढ़िया खाया।नृसिंहानन्द  नेकितनी बढ़िया रसोई की थी।कितने अच्छे से खिलायामुझे।”
अब जाकर शिवानन्द  कोसुदृढ़ विश्वास हुआ।लगता हैनकुल के जैसी गाढ़ी भक्ति उनमें नहीं है।
वेतो प्रभु कोजाकरदेखते हैं।प्रभु तो उनके सामने आविर्भूत होते नहीं, उनकी प्रीति की रज्जुलगता है नकुल के जैसीपक्की नहीं।

*  शिवानन्द के मन में प्रभु के इस तरह भोग ग्रहण करने के विषय में संशय था, इसलियेउन्होंने नकुल को पुनःभोग लगाने के लिए आग्रह किया जिसका नकुल उल्लंघन नहीं कर सके।
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यहहिन्दीअनुवाद परम पूज्य बाबा की प्रेरणा से किया गयासरोज सांगानेरिया एवं सुनीता थावानी का एक संयुक्तविनीतप्रयासहै।इसमेंपूज्य गुरुदेव की वाणी, शब्दों और शैली को यथारूप प्रस्तुत करने का यथासंभव प्रयास किया गया है।